व्याख्यात्मक आलोचना को संदर्भ में रविन्द्रनाथ टैगोर की दिव्यांग रचना 'भिखारिन' का विश्लेषणात्मक अध्ययन
Abstract
यह रचना एक उच्चकोटि की दिव्यांग वृद्ध महिला के जीवन पर आधारित रचना है। वह चक्षु-दिव्यांग है और समाज में व्यवस्थित कार्य न मिल पाने के कारण उसने भीख मांगने का कार्य शुरू किया। यदि दिव्यागों की दिव्यांगता, उनके अंगों की दिव्यांग क्षमता को परखा जाये तो अवश्य ही उनकी दिव्यांगता का समाजोपयोगी पक्ष उभर कर सामने आ जाए। 'भिखारिन' रचना में दिव्यांग वृद्धा ने अपने जीवन को चलाने के लिए एक जून रोटी की व्यवस्था के लिए एक मन्दिर के सामने बैठना शुरू कर दिया। जहाँ आने-जाने वाले लोग उसे कुछ पैसे दे देते जिससे उसकी रोजी-रोटी चल जाती। चक्षु दिव्यांगता होने के कारण भी उसने अपनी दिव्य क्षमता से अनुमान लगा लिया था कि इस मंदिर में आने वाले सहृदय उसे एक-आध रुपये पैसे अवश्य देंगे- "एक अंधी बुढ़िया प्रतिदिन मंदिर के दरवाजे पर जाकर खड़ी हो जाती, दर्शन करने वाले बाहर निकलते तो वह हाथ फैला देती और नम्रता से कहती यह रचना एक उच्चकोटि की दिव्यांग वृद्ध महिला के जीवन पर आधारित रचना है। वह चक्षु दिव्यांग है और समाज में व्यवस्थित कार्य न मिल पाने के कारण उसने भीख मांगने का कार्य शुरू किया। यदि दिव्यागों की दिव्यांगता, उनके अंगों की दिव्यांग क्षमता को परखा जाये तो अवश्य ही उनकी दिव्यांगता का समाजोपयोगी पक्ष उभर कर सामने आ जाए। 'भिखारिन' रचना में दिव्यांग वृद्धा ने अपने जीवन को चलाने के लिए एक जून रोटी की व्यवस्था के लिए एक मन्दिर के सामने बैठना शुरू कर दिया। जहाँ आने-जाने वाले लोग उसे कुछ पैसे दे देते जिससे उसकी रोजी-रोटी चल जाती। चक्षु दिव्यांगता होने के कारण भी उसने अपनी दिव्य क्षमता से अनुमान लगा लिया था कि इस मंदिर में आने वाले सहृदय उसे एक आध रुपये पैसे अवष्य देंगे- "एक अंधी बुढ़िया प्रतिदिन मंदिर के दरवाजे पर जाकर खड़ी हो जाती, दर्शन करने वाले बाहर निकलते तो वह हाथ फैला देती और नम्रता से कहती।"





