भागवत पुराण काल में भारतीय समाज और धर्म का ऐतिहासिक अवलोकन
Abstract
वेदों में सामाजिक, नैतिक मूल्यों का जो वर्णन उपलब्ध होता है, उसी को हमने सामाजिक आदर्श माना। उनमें वर्णित आश्रम व्यवस्था, वर्ण व्यवस्था संस्कार व्यवस्था को ही भारतीय संस्कृति का आधार माना जाता है। पुराण का व्याकरण की दृष्टि से अर्थ है कि जो पुरातन कथाओं का वर्णन करे उसे पुराण कहते हैं। लोगों का यह कथन है कि वेदों के समय में भी पुराणों का अस्तित्व था और बाद में भी उसका अस्तित्व बना रहा, किन्तु इनकी रचना शैली. वेदों की रचना शैली से भिन्न है। पुराणों के अनुसार यह सृष्टि सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग चार युगों में विभाजित है. तथा इन चार युगों के पश्चात प्रलय होता है और पुनः श्रृष्टि सृजित होती है। इन चारों युगों में परमात्मा लोक कल्याणार्थ जन्म लेता रहता है। पुराणों से अन्तदृष्टि मिलती है कि इस युग में जो भी है वह नाशवान है, आनन्द और वैभव भी स्थाई नहीं है। इसलिए आत्म सुख को ही सब कुछ मानना चाहिये।





