सूर्यबाला के कथा साहित्य में स्त्री विमर्श : एक विश्लेषण
Abstract
भारतीय साहित्य परम्परा में स्त्री का स्थान बड़ा ही महत्त्वपूर्ण रहा है। स्त्रीवादी विमर्श में यह माना जाता है कि स्त्री उत्पन्न नहीं होती, बनायी जाती हैं। पितृसत्तात्मक समाज में मातृसत्ता प्रतिबन्धित रही है। पुरुष उसे संदेह की दृष्टि से देखते हैं। उस पर अनेक लांछन लगाते हैं। जिस स्त्री ने उसे जन्म दिया, उस पर वह अनेक अत्याचार करता आया है, लेकिन समय परिवर्तन के साथ ही आज की स्त्रियां बड़ी ही जागरूक होती जा रही हैं। हिन्दी की प्रसिद्ध कथाकार सूर्यबाला के कथा साहित्य के नारी पात्रों में विभिन्नता देखने को मिलती हैं। उनके नारी पात्र कहीं-कहीं मजबूत तथा सक्षम है तो कहीं कहीं पर कुछ कमजोर तथा परम्परागत दिशा को लेकर चलते नजर आते हैं। इस शोध आलेख में मैंने सूर्यबाला के कथा साहित्य में वर्णित नारी पात्रों की दशा एवं दिशा को चित्रित करते हुए समकालीन स्त्री विमर्श पर भी प्रकाश डाला है।





